मन के माने हार है मन के माने जीत

मन मन की बात

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आपने अक्सर अपने मुहँ से ही सुना होगा – ” यार दिमाग खराब हो गया है “. कभी किसी की कोई बात गलत लगने पर आप कह भी देते होंगे – ” अबे दिमाग खराब हो गया क्या तेरा? ” आखिर क्यों हम ये सब दोहराते हैं???  नहीं जानते ?आइये बताते है कि खराब दिमाग से हमारा क्या लेना देना है –

हमारे मन का शरीर पर कितना है प्रभाव ? 

आपने कभी जानवरों को इतना बीमार होते देखा है जितना आज इंसान है ? नहीं , क्योंकि उनमें बहुत ज्यादा मनोरोग नहीं पाए जाते हैं. चिंता , अवसाद , डर और अनावश्यक गुस्सा ये सब इंसानी दिमाग की उपज हैं. हमारी मानसिक स्थिति ही हमारी शारीरिक स्थिति तय करती है. कहा भी गया है कि मन के माने हार है मन के माने जीत. स्वास्थय को बनाये रखने या किसी रोग से छुटकारा पाने के लिए हमें बेहतर खान पान और संयम करने की इच्छाशक्ति चाहिए जो की हमें एक स्वस्थ मस्तिष्क से ही मिलती हैं. इसके अलावा विज्ञान ऐसे बहुत से रोगों के विषय में बताता है जो केवल और केवल मनोस्थिति का परिणाम है –

 अनियमित ब्लड प्रेशर – फ्रांस मेडिकल एसोसिएशन के प्रमुख डॉ. ब्लैवैस्की कहते हैं कि चिंता करना ब्लड प्रेशर के अनियमित होने का कारण हैं. शराब पीने वालों की तुलना में चिंता करने वालों को रक्तचाप की समस्या अधिक होती है. जो व्यक्ति अपने भविष्य की दुखद तस्वीर बना कर रखते हैं उनका रक्तप्रवाह सामान्य नहीं हो पाता है.

मन का करे विश्लेषण  

आप क्या सोचते हैं इसका असर बहुत हद तक आपके शरीर पर पड़ता है.ईमानदारी से अपनी सोच पर थोडा सा ध्यान देने भर से हमें पता चल जायेगा कि हमारा मानसिक स्वास्थ्य कैसा है. अगर थोड़ी बहुत खराबी है तो हम उसे अच्छे तत्वों जैसे संतोष , क्षमाशीलता , दया और प्रसन्नता से रिप्लेस करें. ऐसे जीवन में थोड़ी सी पॉजिटिविटी का संचार कर सकते हैं.

दोहरा व्यक्तित्व दुगुनी समस्याएँ

अगर आप बाहर से खुश और संतुष्ट दिखने का प्रयास करते हैं और मन ही मन अनेकों वहम , चिंतायें , ईर्ष्या इत्यादि पाल लेते हैं तो आपके अन्दर दो व्यक्तियों के बीच घमासान युद्ध चल रहा होता है जो शरीर और मन को भारी क्षति भी पहुंचाता है. इसके कारण आप कमजोर पड़ जाते हैं और मौका देखते ही अनेकों विकार पैदा हो जाते हैं. इसलिए अन्दर और बाहर एक सा रहने का प्रयास करें.

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