लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने पर मुख्य चुनाव आयुक्त ओ पी रावत बोले- कोई संभावना नहीं

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नई दिल्ली: आगमी लोकसभा और विधानसभा का चुनाव एक साथ होगा या अलग-अलग होगा| इस मुद्दे को लेकर सियासी जगत में काफी दिनों से अटकले लगाई जा रही थी| लेकिन अब इन सभी अटकलों पर विराम लगाते हुए मुख्य चुनाव आयुक्त ओ पी रावत ने लो…कसभा और विधानसभा के चुनाव को एक साथ कराने की सभी संभावनाओं को खारिज करते हुए कहा हैं कि जब तक इसका कोई कानूनी ढांचा तैयार नहीं हो जाता, यह मुमकिन नहीं है।

दरअसल पत्रकारों से बात करते हुए ओ पी रावत ने कहा कि मौजूदा ढांचे में इसकी कोई संभावना नहीं है। बता दे,  कि आगामी लोकसभा का चुनाव अगले साल अप्रैल-मई में संभावित है, वहीं मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान और मिजोरम विधानसभा के चुनाव भी इस साल के अंत में होने हैं।

गौरतलब है कि केंद्र की मोदी सरकार कुछ राज्यों में एक साथ लोकसभा और विधानसभा चुनाव करवाने के पक्ष में है। केंद्र ने इसके पीछे तर्क दिया है कि एक साथ होने से सरकार के खर्च में कमी आएगी और राजस्व की बचत होगी। एक अनुमान के मुताबिक, 16वीं लोकसभा के चुनाव पर कोई 3,800 करोड़ रुपये खर्च हुए। यदि विधानसभा चुनावों पर होने वाले खर्चों को जोड़ा जाए, तो यह राशि बहुत बड़ी रकम हो जाएगी। एक साथ चुनाव होने से राजनीतिक दलों के चुनाव पर होने वाले खर्च में भारी कमी आएगी, जिसके अपने लाभ हैं।

हालांकि लोकसभा और विधानसभा का चुनाव एक साथ कराने का सुझाव कोई नया नहीं है। इससे पहले न्यायमूर्ति जीवन रेड्डी ने चुनाव सुधार संबंधी विधि आयोग के प्रतिवेदन में 1999 में इसका जिक्र की थी। भाजपा के वरिष्ठ नेता श्री लालकृष्ण आडवाणी ने ने साल 2009 में इसका प्रतिपादन किया था। पूर्व राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी और संसद के कार्मिक विभाग संबंधी समिति ने भी इसका समर्थन किया था।

आपकी जानकारी के लिए बता दे, कि कि पहली लोकसभा से लेकर चौथी लोकसभा तक (1952, 1957, 1962 और 1967) लोकसभा और विधानसभा के चुनाव एक साथ ही होते रहे। लेकिन या परंपरा आगे चलकर टूट गयी| यह संस्थापित परंपरा 1969 में तब टूटी, जब लोकसभा समय से पहले भंग कर दी गई थी।

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