क्या हो सकते हैं 2019 लोकसभा चुनाव के नतीजे – एक निष्पक्ष विश्लेषण

लोकतंत्र के महाकुम्भ में कौन करेगा शाही स्नान

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इस लेख को शुरू करने से पहले एक तथ्य को केंद्र में रखते हैं कि पिछले कुछ सालों से भारतीय जनता में अपने देश की राजनीति के प्रति जागरूकता दिखाई पड़ती है. चुनावी चर्चाओं नें गली नुक्कड़ों से निकल कर घरों की ओर रुख किया है. यह एक सकरात्मक प्रतीक है और इन्ही चर्चाओं के आधार पर 2019 लोकसभा चुनाव को लेकर कुछ कयास लगाए जा सकते हैं. 2014 लोकसभा चुनाव में बीजेपी निर्विवाद रूप से एक शक्तिसंपन्न पार्टी के रूप में उभर कर आयी थी. इसे विशषज्ञों ने मोदी लहर का परिणाम बताया था लेकिन आज के परिपेक्ष्य में बीजेपी का काम किसी लहर से नहीं चलने वाला है क्योंकि जनता के पास पार्टी का पंचवर्षीय रिपोर्ट कार्ड उपलब्ध है जिसके आधार पर ही पार्टी का भविष्य निर्धारित होगा.

कौन कितने पानी में ?

लोकतंत्र के विशालतम स्वरूप का इतिहास देखें तो यूपीए और एनडीए ही लोकसभा चुनाव के प्रबल दावेदार माने जाते हैं और तीसरे मोर्चे का प्रभुत्व सीमित दिखाई देता है. 2014 में यूपीए का राज देश की 35 फ़ीसदी आबादी पर था तब एनडीए 22 फ़ीसदी आबादी तक सीमित थी लेकिन अब एनडीए का यह आंकड़ा 68 फ़ीसदी तक पहुँच गया है. विश्लेषक कहते हैं कि दो बड़े राज्यों बिहार और उत्तर प्रदेश की आतंरिक राजनीति का प्रभाव दिल्ली की कुर्सी पर दिखाई देता है.उत्तर प्रदेश में गठबंधन की राजनीति करके सपा-बसपा ने काफ़ी वोटों का ध्रुवीकरण किया और बीजेपी के लिये चुनौती खड़ी कर दी है . इस क्षेत्रीय गठबंधन को कांग्रेस जैसी देशव्यापी पार्टी का साथ मिला तो 2019 लोकसभा चुनाव में राजनीति नया मोड़ लेगी.इस महामोर्चा प्लान के चलते संभवतः बीजेपी का एकछत्र राज का सपना टूट सकता है.

हालाँकि बीजेपी इन दिनों पूर्वोत्तर राज्यों को लुभाने में कामयाब रही है और पश्चिम बंगाल में भी हिन्दू विरोधी घटनाओं के चलते बीजेपी के फलने फूलने की सम्भावना बन रही है जो बीजेपी को आड़े समय में यथोचित लाभ देंगी. केंद्र सरकार की भूमिका में बीजेपी की बात करें तो पिछले पांच सालों में कई बड़े फैसले सरकार को लेने पड़े हैं जिनकी वजह से आलोचना और प्रशंसा दोनों का सामना सरकार ने किया है. वहीं दूसरी ओर कांग्रेस कुशल नेतृत्व का अभाव , विपक्ष के रूप में झेल रही है. अब चुनाव करीब आ रहे हैं तो ज़ाहिर है दोनों पक्षों ने नए चुनावी एजेंडा तैयार किये होंगे. हाल ही में कुछ ऐसी घटनाएँ सामने आयी हैं जो बारीकी से देखने पर चुनावी रणनीतियों का परिणाम दिखाई देती हैं.

अम्बेडकर पर सियासत – किसके हैं भीम ??

अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति अत्याचार निवारण एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के विरोध में 2 अप्रैल 2018 को दलितों ने भारत बंद का ऐलान किया था. इस भारत बंद के दौरान देश भर में दलितों ने प्रदर्शन किया और कई राज्यों में हिंसा भी हुई. सर्वोच्च न्यायलय का कहना था कि एससी/एसटी अत्याचार मामलों में तत्काल गिरफ्तारी नहीं हो सकेगी. दलितों को यह फैसला नागवार गुज़रा और जातिगत हिंसा की स्थिति बन गयीं. दलितों ने केंद्र सरकार को भी निशाना बनाया जबकि केंद्र सरकार ने इस फैसले पर कोर्ट में पुनर्विचार याचिका तुरंत प्रभाव से दायर की थी. मीडिया का मानना है कि यह जातिगत समीकरण बीजेपी विरोधी पार्टियों द्वारा 2019 लोकसभा चुनाव में दलित वोटों के ध्रुवीकरण के लिए रचा गया है.

कठुआ गैंगरेप में दिखा राजनीति का विकृतम स्वरुप :

जम्मू कश्मीर के कठुआ में गत जनवरी माह में आठ साल की बच्ची का बेरहमी से गैंगरेप हुआ और बाद में उसकी हत्या कर दी गई. बच्ची एक विशेष धार्मिक संप्रदाय से जुड़ी थी अतः धार्मिक गतिरोध के चलते कई राजनीतिक पार्टियों और आम नागरिकों ने हिन्दुओं पर निशाने साधे. बीजेपी को हिन्दू पार्टी मानने वालों ने देश में ऐसा माहौल बनाने का प्रयास किया जो अन्य धर्मों के लिये सुरक्षित नहीं है. राजनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि इस मामले में मीडिया और कुछ कट्टर व्यक्तियों द्वारा धर्म को अनावश्यक रूप से मुद्दा बनाया गया ताकि 2019 लोकसभा चुनाव में मुस्लिम वोटबैंक और बीजेपी का रिश्ता तोड़ा जा सके.

क्या कहता है देश –

जटिल राजनीतिक समीकरणों को समझने की कोशिश में लगी भारतीय जनता को कुछ ईमानदार मीडिया घरानों ने समय समय पर सच्चाई से रूबरू कराया है जिसके बाद जनता स्वविवेक से कुछ अच्छे निर्णय ले लेती है और लोकतंत्र का समुचित लाभ उठा पाती है. ऐसी ही कुछ उम्मीद 2019 लोकसभा चुनाव में नज़र आती है. देखते हैं जनता का फैसला इन राजनीतिक एजेंडो से कहाँ तक प्रभावित होता है.

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