खो गयीं इरोम शर्मिला चानू , ऐसा ही होता है एक उम्मीद का टूटना

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खो गयीं इरोम शर्मिला चानू , ऐसा ही होता है एक उम्मीद का टूटना
अहिंसक आन्दोलन का एक हारा हुआ उदाहरण हैं इरोम शर्मिला

 संघर्ष का असली मतलब समझना है तो इरोम शर्मिला के जीवन को गौर से देखिये.सूखे हुए पेड़ के पत्तों की तरह संघर्ष अपने समस्त स्वरूपों में बिखरता चला जाएगा. इरोम सम्मानपूर्ण सहानुभूति के लायक हैं.गांधी के बाद वह पहली ऐसी भारतीय हैं, जिन्होंने अहिंसक आंदोलन को जिया है.

इरोम ने तथाकथित खूनी कानून ‘अफ्स्पा’ को हटाने के लिए 16 साल पहले जब आमरण अनशन शुरू किया तब मणिपुर के हालात बेहतर नहीं थे. वहाँ लगातार हिंसा बढ़ रही थी. इरोम पुलिस अभिरक्षा में रहतीं. हर रोज जबरदस्ती उनकी नाक के रास्ते उन्हें तरल भोजन दिया जाता ताकि वह जिंदा रहें. एक लड़की जो अभी अभी बड़ी हुई थी उसने जीवन का सारा रंग मोह त्याग दिया. अपने जीवन के सबसे सुन्दर दिन एक संघर्ष के नाम कर दिए.

इरोम की समझ में एक सच बहुत देर में आया कि आम मणिपुरी नागरिक को उनके मरने जीने से कोई फर्क नहीं पड़ता. ऐसे लोगों के लिये वो कब तक भूखी रहती. इरोम बड़ी आशा के साथ राजनीति में आयी. पीआरजेए (पीपुल्स रिसर्जेंस एंड जस्टिस अलायंस) नाम से पार्टी बनाई. उन्हें उम्मीद थी कि कोई तो उनकी आवाज़ में आवाज़ मिलायेगा , लेकिन मणिपुर की 60 सीटों वाली विधानसभा के लिए उनकी पार्टी से चुनाव लड़ने को सिर्फ दो लोग राजी हुए,  इरोम के समेत कुल तीन. इन लोगों ने चंदा जमा किया. मुश्किल से साढ़े चार-पांच लाख रुपए जमा किए होंगे. लेकिन उनकी यह कोशिश, भाजपा-कांग्रेस के भारी-भरकम इंतजामों के बीच छोटी पड़ गई.

इरोम शर्मिला चानू को मणिपुर की थोबल सीट पर सिर्फ 90 वोट ही मिले.सारे उम्मीदवारों में चानू आखिरी नंबर पर रहीं. जाहिर है इरोम के लिये यह दिल तोड़ने वाला दिन रहा होगा. चुनाव नतीजों के तुरंत बाद उन्होंने अपना दर्द व्यक्त किया था –

“ मैं जैसी हूं , उस तरह लोगों ने मुझे स्वीकार नहीं किया. मैं खुद को ठगा हुआ महसूस करती हूं. मैं अब राजनीति से बुरी तरह थक चुकी हूं. इसलिए अगले कुछ दिन तक आश्रम में रहकर आराम करना चाहती हूं.’’

अब देखना यह है कि जीवन में संघर्ष लिये वो कब तक अकेली डटी रहेंगी .

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